17 जून की शाम करीब 6:30 बजे रोज़ की तरह रिशु गुप्ता अपनी मोमोज़ की स्टॉल पर काम कर रही थीं। ग्राहकों की आवाजाही जारी थी और स्टीमर में पानी खौल रहा था।
आरोप है कि तभी पुलिस की गाड़ी पहुंची और स्टॉल हटाने को कहा गया। रिशु ने केवल इतना अनुरोध किया कि उन्हें दो मिनट का समय दिया जाए, क्योंकि स्टीमर में पानी बेहद गर्म था और उसे सुरक्षित तरीके से हटाना ज़रूरी था।
लेकिन प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, एक पुलिसकर्मी ने स्टीमर को ज़ोर से धक्का दे दिया, जिससे खौलता हुआ पानी रिशु गुप्ता के ऊपर जा गिरा। बताया जा रहा है कि इस हादसे में वह बुरी तरह झुलस गईं और उनके हाथ, सीने तथा शरीर के अन्य हिस्सों पर गंभीर जलन हुई।
आरोप यह भी है कि मुख्यमंत्री के काफिले के गुजरने से पहले रास्ता खाली कराया जा रहा था। ये आरोप सही हैं, तो कई गंभीर सवाल खड़े होते हैं:
रास्ता खाली कराने की पूर्व सूचना क्यों नहीं दी गई? क्या एक मेहनतकश महिला की सुरक्षा से बढ़कर वीआईपी मूवमेंट है? इस घटना के लिए जिम्मेदार लोगों पर क्या कार्रवाई होगी? पीड़िता के इलाज और मुआवजे की व्यवस्था कौन करेगा?
कानून का पालन कराना जरूरी है, लेकिन किसी नागरिक की जान और सुरक्षा को खतरे में डालकर नहीं।
जयपुर के रामनगरिया इलाके की युवती रेशु गुप्ता की पीड़ा केवल एक व्यक्ति की त्रासदी नहीं है, बल्कि यह उस प्रशासनिक मानसिकता का भयावह उदाहरण है जिसमें सत्ता के छोटे-से अधिकार से लैस लोग आम नागरिकों की गरिमा, अधिकार और जीवन को महत्वहीन समझने लगते हैं।
रेशु का आरोप है कि पुलिसकर्मी ने उसके मोमोज कार्ट पर रखे स्टीमर को धक्का दिया, जिससे खौलता पानी उसके शरीर पर गिर गया और वह गंभीर रूप से झुलस गई, तो यह केवल लापरवाही नहीं बल्कि संवेदनहीनता और शक्ति के दुरुपयोग का गंभीर मामला है।
रेशु की बातों में जो सबसे अधिक विचलित करने वाला पक्ष है, वह केवल शारीरिक चोट नहीं, बल्कि उसका मानसिक आघात है। एक युवा महिला, जिसकी अभी शादी नहीं हुई, जो अपने परिवार का सहारा बनने के लिए संघर्ष कर रही थी, जब यह कहती है कि “मेरी छाती का एक हिस्सा बुरी तरह झुलस गया है, मेरा भविष्य कैसा होगा, इसकी कल्पना से मेरी रूह कांप जाती है”, तब यह केवल एक व्यक्तिगत दर्द नहीं रह जाता। यह उस समाज की विफलता का दस्तावेज बन जाता है जो अपने मेहनतकश नागरिकों को सुरक्षा देने में असफल हो रहा है।
यह ध्यान देने योग्य है कि रेशु कोई अपराधी नहीं थी। वह कोई अवैध गतिविधि नहीं चला रही थी। वह एक शिक्षित युवती है, जिसने बीएससी की पढ़ाई की, प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी की, लेकिन अवसर न मिलने पर आत्मनिर्भर बनने का रास्ता चुना। पिता की मृत्यु के बाद परिवार की जिम्मेदारी उठाने के लिए उसने केवल 25 दिन पहले एक छोटा-सा मोमोज कार्ट शुरू किया था। ऐसे समय में जब सरकारें स्वरोजगार, स्टार्टअप और आत्मनिर्भरता के नारे देती हैं, एक युवती का इस तरह हतोत्साहित होना अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है।
घटना का दूसरा और अधिक चिंताजनक पहलू पुलिस का कथित व्यवहार है। यदि किसी पुलिसकर्मी की कार्रवाई से कोई व्यक्ति घायल हो जाता है तो पहला दायित्व उसे चिकित्सकीय सहायता उपलब्ध कराना होता है। लेकिन आरोप है कि रेशु दर्द से चीखती रही और पुलिसकर्मी वहां से चले गए। इससे भी अधिक दुखद यह है कि अन्य पुलिसकर्मियों ने भी रुककर मदद नहीं की। यह व्यवहार केवल कर्तव्यहीनता नहीं, बल्कि मानवीय संवेदनाओं के क्षरण का प्रमाण है।
लोकतांत्रिक व्यवस्था में पुलिस का अस्तित्व जनता की सुरक्षा और कानून के निष्पक्ष पालन के लिए है। लेकिन जब वही पुलिस किसी पीड़ित की सहायता करने के बजाय उससे दूरी बना ले, तब जनता का विश्वास डगमगाने लगता है। पुलिस की वर्दी केवल अधिकार का प्रतीक नहीं, बल्कि जिम्मेदारी और संवेदनशीलता का भी प्रतीक होनी चाहिए।
इस मामले में एक और गंभीर आरोप यह है कि एफआईआर दर्ज कराने में टालमटोल की गई और समझौते का दबाव बनाया गया। यदि यह सच है तो यह कानून के शासन की मूल भावना के विरुद्ध है। किसी भी शिकायत की निष्पक्ष जांच का पहला कदम एफआईआर दर्ज करना होता है। लेकिन हमारे देश में अक्सर देखा गया है कि जब आरोप सत्ता या प्रशासन से जुड़े लोगों पर हों तो शिकायत दर्ज कराने में ही बाधाएं खड़ी कर दी जाती हैं।
यह प्रवृत्ति नई नहीं है। भारत में अनेक मामलों में देखा गया है कि दुर्घटना या अत्याचार के बाद सबसे पहले सच्चाई को दबाने, समझौता कराने या पीड़ित को डराने का प्रयास किया जाता है। ऐसा लगता है मानो संस्थाओं की पहली चिंता न्याय नहीं, बल्कि अपनी छवि बचाना हो। जबकि लोकतांत्रिक संस्थाओं की प्रतिष्ठा गलतियों को छिपाने से नहीं, बल्कि उन्हें स्वीकार कर निष्पक्ष कार्रवाई करने से बढ़ती है।
यदि रेशु और उसकी बहन के आरोप सही हैं कि उन्हें यह कहकर डराया गया कि मुख्यमंत्री का काफिला प्रभावित हुआ है और उनके खिलाफ भी कार्रवाई हो सकती है, तो यह अत्यंत गंभीर प्रश्न खड़ा करता है। क्या नागरिकों को न्याय मांगने की कीमत डर और धमकी के रूप में चुकानी पड़ेगी? क्या प्रशासन की प्रतिष्ठा एक गरीब युवती के अधिकारों से अधिक महत्वपूर्ण है?
यह घटना भारत की उस व्यापक समस्या की ओर भी संकेत करती है जिसमें फुटपाथ विक्रेताओं, रेहड़ी-पटरी वालों और छोटे व्यवसायियों को अक्सर प्रशासनिक उत्पीड़न का सामना करना पड़ता है। शहरों को सुंदर बनाने और यातायात व्यवस्थित रखने की आवश्यकता से कोई इंकार नहीं कर सकता। लेकिन कानून लागू करने का तरीका भी उतना ही महत्वपूर्ण है जितना उसका उद्देश्य। किसी कार्ट को हटवाने के लिए बल, धमकी या असावधानी का प्रयोग किसी भी स्थिति में उचित नहीं ठहराया जा सकता।
वास्तव में सड़क किनारे छोटे कारोबार करने वाले लोग भारतीय अर्थव्यवस्था के महत्वपूर्ण हिस्से हैं। वे लाखों परिवारों की जीविका का आधार हैं। सरकारें एक ओर स्वरोजगार को बढ़ावा देने की बात करती हैं, दूसरी ओर स्थानीय स्तर पर ऐसे लोगों के साथ अपमानजनक व्यवहार की शिकायतें लगातार सामने आती रहती हैं। यह विरोधाभास चिंताजनक है।
इस घटना का एक लैंगिक पक्ष भी है। एक युवा महिला के लिए शरीर पर स्थायी चोट केवल स्वास्थ्य का प्रश्न नहीं होती। भारतीय समाज में विवाह, सामाजिक स्वीकृति और आत्मविश्वास जैसे अनेक पहलू इससे जुड़े होते हैं। इसलिए रेशु की मानसिक पीड़ा को केवल चिकित्सकीय आंकड़ों से नहीं समझा जा सकता। उसे लंबे समय तक मनोवैज्ञानिक सहायता और सामाजिक सहयोग की भी आवश्यकता होगी।
अब सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न है कि आगे क्या होना चाहिए?
सबसे पहले, इस मामले की निष्पक्ष और समयबद्ध जांच होनी चाहिए। जांच किसी ऐसे अधिकारी या एजेंसी से कराई जानी चाहिए जिस पर पक्षपात का आरोप न लगे। यदि पुलिसकर्मी की लापरवाही या दुर्व्यवहार सिद्ध होता है तो उसके खिलाफ कानूनी कार्रवाई होनी चाहिए।
दूसरे, पीड़िता के संपूर्ण उपचार की जिम्मेदारी राज्य को उठानी चाहिए। जलने के घावों का इलाज लंबा और महंगा होता है। यदि भविष्य में प्लास्टिक सर्जरी या अन्य चिकित्सा प्रक्रियाओं की आवश्यकता हो तो उनका खर्च भी सरकार को वहन करना चाहिए।
तीसरे, पुलिस विभाग को इस घटना को केवल एक व्यक्तिगत गलती मानकर भूल नहीं जाना चाहिए। यह आत्ममंथन का अवसर है। पुलिस प्रशिक्षण में संवेदनशीलता, मानवाधिकार और संकट की स्थिति में नागरिक सहायता जैसे विषयों पर अधिक बल दिया जाना चाहिए।
चौथे, सड़क विक्रेताओं और छोटे कारोबारियों के साथ व्यवहार के लिए स्पष्ट मानक प्रक्रियाएँ बनाई जानी चाहिए ताकि किसी भी अधिकारी को मनमानी करने का अवसर न मिले।
किसी भी सभ्य समाज की पहचान इस बात से नहीं होती कि वह शक्तिशाली लोगों के साथ कैसा व्यवहार करता है, बल्कि इससे होती है कि वह सबसे कमजोर और असुरक्षित नागरिकों के साथ कैसा व्यवहार करता है। रेशु गुप्ता एक साधारण युवती है, जिसके पास न राजनीतिक प्रभाव है, न आर्थिक शक्ति। उसके पास केवल अपना सच और न्याय की उम्मीद है।
राज्य, पुलिस प्रशासन और समाज की परीक्षा इसी बात में है कि क्या वे इस उम्मीद को जीवित रख पाते हैं या नहीं। यदि इस मामले में भी सच्चाई दबा दी गई, समझौते का दबाव हावी हो गया और दोषी बच निकले, तो यह केवल एक युवती के साथ अन्याय नहीं होगा; यह नागरिकों के उस विश्वास पर भी चोट होगी जिसके सहारे लोकतांत्रिक संस्थाएँ खड़ी रहती हैं।
रेशु की झुलसी हुई त्वचा के घाव शायद समय के साथ भर जाएँ, लेकिन यदि न्याय नहीं मिला तो व्यवस्था के चेहरे पर लगा यह दाग बहुत लंबे समय तक दिखाई देता रहेगा।
(शैलेंद्र चौहान लेखक-कवि हैं और अनियतकालिक पत्रिका धरती के संपादक हैं।)